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एक नई शुरुआत: जब कलम फिर से बोल उठी!

जिंदगी के हर सफर की तरह, मेरे लेखन का यह सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक समय ऐसा आया जब करीब सौ कविताएं लिखने के बाद, मेरा मन अपनी ही लिखावट से ऊब गया था। वह मोड़ इतना गहरा था कि मैंने लिखने से ही मुँह मोड़ना चाहा और अपनी डायरी के उन तमाम पन्नों को फाड़ दिया, जिन्हें मैंने सालों की मेहनत और भावनाओं से सींचा था।

यह साल 2013 की बात है, जब मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में एक नए संघर्ष की ओर निकल पड़ा था। उस वक्त लगा जैसे शब्दों का साथ छूट गया है।

पर कहते हैं न कि जिससे रूह का रिश्ता हो, उससे दूरी मुमकिन नहीं। शब्दों से मेरा लगाव कुछ इस कदर था कि मैं चाहकर भी बहुत ज्यादा दिनों तक खुद को कलम उठाने से रोक नहीं सका।
भीतर की बेचैनी और जज्बातों के शोर ने मुझे फिर से पुकारा। हार मानकर नहीं, बल्कि एक नए संकल्प के साथ मैंने पुनः निश्चय किया कि मैं फिर से लिखूँगा। और इस बार, मेरी कलम पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और स्पष्ट थी।
"वो पन्ने तो फट गए थे, पर स्याही का निशान आज भी दिल पर बाकी था।"
कुछ समय के अंतराल के बाद जब मैंने दोबारा लिखने का निश्चय किया, तब जो कविता कागज़ पर उतरी, वह मेरे दिल के सबसे करीब है। यह एक ऐसी रचना है जिसे मैंने आज तक कभी बदलना नहीं चाहा। जैसे ही मैंने कलम उठाई, शब्द बिना रुके खुद-ब-खुद डायरी पर उतरते चले गए।
आज वही कविता और वही अहसास मैं आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ...


छोटी सी इस ज़िन्दगी की,

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क्या खोया उसकी चिंता भी है,
है इसकी भी की क्या बचा है मुझमें,
इन्हीं तीनों में रहा ताउम्र उलझा,
मैं, मेरा और मुझमें।

डिअर पापा !



हालात चाहे कैसे भी रहे,

हँसी हर वक़्त देखी चेहरे पे आपके,

मुझे ना हमेशा से हीं आप जैसा बनना था,

ना काम ना ज़्यादा, बिलकुल नाप के,

कद काठी थोड़ी अलग भी हो,

मुझे आप सा ह्रदय हीं चाहिए था,

मुझे आप सी बोली चाहिए थी,

मुझे आप सा व्यवहार चाहिए था,

आज अगर जो मैं थोड़ा भी कुछ हुँ,

थोड़ी भी अलग जो मेरी पहचान है,

तो ये एक अकेली मेहनत मेरी नहीं,

ये आपके भी संघर्षों का परिणाम है,

सब आपसे हीं तो पाया है,

ये बोल चाल, ये व्यवहार,

ये तौर तरीके जीवन के,

अब आपकी खुशियों के खातिर,

मेरी भी कोशिश तमाम है,

आपसे कभी कहा नहीं खुल के,

कुछ बातें जो आपसे कहनी बहुत ज़रूरी थीं,

अब वक्त बीत रहा है तो,

याद सब कुछ आता है,

मेरा तो आपको पता है ना,

मेरे से कहाँ कुछ भुला जाता है।

यूँ तो खुद की दुनिया

बसा ली है इस शहर में फिर भी,

गाँव में अपने,

मैं आपसे पहचाना जाता हुँ,

मुझे गर्व होता है सुन के,

जब भी मैं आपके नाम से जाना जाता हुँ,

हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा ही सब कुछ दिया,

कहाँ आप 'ना' कभी हमसे कहते थे,

करके पूरे शौक हमारे,

कितने सादे आप रहते थे,

बात हमेशा उतनी ही नहीं होती थी,

जितनी आप हमसे कहते थे,

मैंने सीखा है आपसे पापा,

कि जब वक्त बुरा हो तो,

धैर्य कैसे खुद में रखते थे,

मैंने सीखा है आपसे ठहराव,

मुश्किल होती राहों में,

मैंने सीखा है आपसे कि,

शौक मन में कैसे दब जाते हैं,

मैंने सीखा है आपसे कि,

ज़िम्मेदारी कैसे निभाई जाती है,

मैंने सीखा है आपसे,

रिश्ते कैसे बचाए जाते हैं,

एक ख्वाब मैं जिसके पिछे हुँ,

एक तमन्ना जो अभी भी है अधूरी,

कि करूँ हासिल कोई मुकाम ऐसा,

फिर गले लगूँ आपके,

करके मैं अपनी छाती चौड़ी,

भर जाए तो, भर जाए चाहे,

आँखें उस पल हम दोनों की,

ओह! माँ भी तो साथ खड़ी होगी,

फिर मैं बात कर रहा हम तीनों की,

कल लोग आपको मेरे नाम से जानें,

मुझे उस मुकाम तक जाना है,

जिनमें बसती हों खुशियाँ आपकी,

मुझे हर वो ख्वाब सजाना है,

आपने अपने किरदार को,

बखूबी है निभाया पापा,

मुझे भी तो अब आखिर में,

अपना फर्ज़ निभाना है!


इससे आगे दिखता ना कुछ, 
कितनी अजीब सी ये बदहाली है,
मन मेरा क्रोधित सा है,
और हाथ दोनो मेरे खाली हैं,
नींदें कहीं लापता हों जैसे,
अनगिनत खयाल हैं चल रहे,
सूरज को भी है रोक रखा,
ये रात कितनी काली है,
टूटे हौंसले कई मर्तबा पर,
हमने सांसें संभाली है,
गैरों को भी अपना कह के,
गलतफहमी भी पाली है,
खुद को यकीन दिलाना,
मुश्किल सा हो रहा है की,
जो ख्वाब जाग रातों को पकाए, 
पुलाओ ये ख्याली हैं। 

एक और कोशिश करते हैं।



यहाँ कौन किसी की सुनता है,
तू मत हीं किसी को ज्ञान दे,
क्या कमी रही होगी इस बार,
तू उसपे बस ध्यान दे,
जो जलते हों देख तुझे,
उन आंखों को चाहे तू खलता रह,
बस मंजिल को ध्यान में रख के,
राहों पे निडर तू चलता रह,
क़िस्मत चाहे रूठी भी हो,
तू कायम रह अपनी मेहनत पे,
वो देगा वही जो अच्छा होगा,
क्यों रुकना बस उसकी रहमत पे,
चलो फिर साथ मिल कर हीं,
अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हैं,
फिर से हौसला भड़ते हैं,
एक और कोशिश करते हैं।

 बिन तुम्हारे



तुम बिन बड़ा खाली सा है,

वो लम्हा,

कि जिसमे तुम पास थे,

ये घर की जिसमे तुम साथ थे,

घर में सब कुछ तो वही है,

वही पलंग वही सोफा,

वही खिड़की वही परदे,

पर इनमे वो रौनक हीं नहीं,

जो तुम्हारे होने से रहती है,

इनमे खूबसूरती तो है पर सादगी नहीं,

जो इनमे तू बिखेरती है,

कहो तो तुम्हे बताऊँ मैं,

कि तुम बिन मैं कितना अकेला हूँ,

समझ लो जैसे कि,

इंद्रा धनुष रंगो के बिन,

आसमा पतंगों के बिन,

जवानी कोई उमंगों के बिन,

या समंदर जैसे तरंगों के बिन,

फूल कोई हो खुशबु बिन,

दीप कोई हो बाती बिन,

सुर जैसे हो ताल बिन,

और दिन तनहा जैसे रात बिन,

सोच सोच दिन रात खुद को,

और बेहतर पहचाना ये,

दिल की एक बात तुम्हे,

तुम बिन रह कर है जाना ये,

ये धरती, अम्बर, चाँद, सितारे,

अच्छे नहीं लगते बिन तुम्हारे,

ये ख्वाब, हक़ीक़त,दुनिया के नज़ारे,

भाते नहीं मुझे बिन तुम्हारे!

नाराज़गी



नाराज़गी

खुद से,

खुद को बेहतर ना बना पाने की,

या खुद में रह कर,

खुद को ना समझ पाने की,

कुछ खास जिसे,

अभी तक भी पा ना सका,

या कोई राह जिसपे,

चाह कर भी मैं जा ना सका,

कुछ बंदिशें जिसे,

था तोड़ना मुझे कब का,

कुछ आदतें जिसे,

था छोड़ना मुझे कब का,

कुछ ख्वाब जो महज,

ख्वाब हीं रह गए,

कुछ अरमान दिल के,

जो बस दिल में हीं रह गए,

जो ख्वाइशें थी मेरे दिल की,

क्यूँ ना कह पाया किसी से अब तक,

कोई भरोसा या कोई सांत्वना,

क्यूँ मिला नहीं मुझे किसी से अब तक,

ये मेरी जरुरत थी या मजबूरी,

जो मैं दूर आ गया अपनों से,

जिनके लिए था जीता कभी,

मैं डरने लगा उन सपनो से,

मैं छोड़ सवेरे घर के अपने,

कहीं पड़ा रहा वीराने में,

अब ढूंढने में हुँ लगा,

कमी मुझमे थी या ज़माने में,

इन्ही दो प्रश्नों में उलझा हुँ आज कल,

सोचता हुँ कभी की,

बाँट लूँ थोड़ा,

मन की अपनी ये चिंताएं,

पर समझे आखिर कौन मुझे,

मन की मेरी ये व्यथाएँ,

कोई सुने मुझको ख़ामोशी से,

अपने प्रश्नों को रख के खुद में,

कहाँ मिला मुझे कोई अब तक ऐसा,

तभी उलझा रहा हुँ अब तक खुद में,

समेट रहा हुँ लम्हों को,

बीती हुई कुछ यादों को,

खुद को याद दिला रहा हुँ,

खुद से किये कुछ वादों को,

बस इन्ही उलझनों में कहीं,

खो गई है चेहरे की ताज़गी,

मुझपे आज कल हावी है,

मुझसे ये मेरी नाराज़गी!

मुझे मेरा घर याद आता है........



जब खुद की, की हुई गलतियों से,
सबक ये जिंदगी लेती है,
तन्हाईयाँ हौले से तभी,
मेरे दिल पे दस्तक देती है,
जब खुद को समझाने की,
कोशिशें कम पड़ जाती है,
जब हंसता चेहरा होता है पर,
आँखें नम पड़ जाती है,
जब कही किसी की बात कोई,
मन में घाव कर जाती है,
जब भुलाने से भी बात कोई,
मुझसे न भूली जाती है,
जब कोई बुरा सपना मन को,
भीतर हीं भीतर डराता है,
जब बेफिज़ूल की बातों से,
मन मेरा घबराता है,
जब अच्छे बुरे में मुझको कोई,
फर्क समझ न आता है,
जब दिल पे चोट लगती है,
या कोई दर्द सहा न जाता है,
मुझे तब मेरा घर याद आता है,
की वो पीछे छूटा मेरा
शहर याद आता है,
मुझे तब मेरा घर याद आता है,
शायद वही एक जगह है जहाँ,
मुझको बेहतर समझा गया,
खामियां भी निकाली गई मुझमें,
पर मुझसे हीं सब कहा गया,
जहाँ मुझ पर कभी जो आंच आई तो,
गम साथ में आ के काटा गया,
घर वो जहाँ मेरी खुशियों को,
मुझसे हीं अंत में बांटा गया,
घर वो जहां पे सीखा सब कुछ,
जीने का हर एक हीं ढंग,
घर वो जहां थी जीने में,
हर एक पल एक नई उमंग,
घर वो जहाँ अपनों के संग,
कोई पल भारी न लगा कभी,
मैं सोया जहाँ सुकून से सदा,
बेचैनियों में भी न जगा कभी,
घर वो जहां खाने में अलग एक,
प्यार का स्वाद होता था,
घर वो जहां चिंता फिक्र से,
दिल आजाद होता था,
घर वो जहां त्योहारों में,
एक अलग हीं रौनक होती थी,
घर वो जहां पे खुशियों की,
हर रोज हीं दस्तक होती थी,
कितना कुछ कहूं,
कितना सुनोगे आप मुझे,
सुनो वो जो कहा नही अभी,
तब समझ पाओगे मुझे,
मैं थक गया हूँ अब थोड़ा,
मैं थक गया हूँ अब थोड़ा,
दुनिया की इस भाग दौर से,
कुछ है जो कह न सका आज भी,
मेरी ख़ामोशी को तुम सुनो गौर से!

मेरे यार मेरे दोस्त मेरे भाई, तुम बहुत याद आओगे....

मेरे यार मेरे दोस्त मेरे भाई,

तुम बहुत याद आओगे,

तुम्हारे किस्से तुम्हारी बातें,

अब भी सोचते  हैं तो हंसते हैं,

न चाहते हुए भी आपस में,

जिक्र तुम्हारा कर हीं देते हैं,

किसी को यकीन

आज भी नहीं होता है की,

तुम जिस आशिकी पे सब की हंसते थे,

सीधे शब्दों में हम सब को,

अक्सर हीं तुम कोसते थे,

तुमसे तो बिलकुल भी किसी को,

उम्मीदें ऐसी थी हीं नहीं,

हम सब के बीच एक,

तुम्हीं तो समझदार लगते थे,

फिर तुम कैसे इक पल में,

जिंदगी से ऐसे हार गए,

सपने तुम्हारे भी थे फिर कैसे,

हर ख्वाइश को तुम मार गए,

आज भी पछतावा होता है,

की उन आखिरी पलों में हम में से

कोई साथ क्यों नहीं था तुम्हारे,

शायद कोई रहता उन पलों में,

तो होते तुम आज बीच हमारे,

इक बार सही पर हर दफा आपस में,

पूछते जरूर हैं एक दूजे से

की गलती आखिर थी किसकी,

तुम गलत थे या समय खराब था,

या वो शराबी दोस्त तुम्हारा,

साथ रह रहे थे तुम जिसके,

खैर इन बातों का कभी अंत न होगा,

तुमसे कहने को इतना कुछ है पास हमारे,

इक दफा घरवालों की हीं सोच लेते,

वो भी तो थे खास तुम्हारे,

तुम्हे खबर है क्या जरा भी,

तुम्हारे जाने के बाद,

मां का तुम्हारी हाल क्या था,

जिस दिन तुम गए

हम में से किसी को,

खाना तक रास न आ रहा था,

सुबह हीं तो बात हुई थी तुमसे,

यकीन नहीं हो रहा था की,

अब कभी लौट के तुम नहीं आओगे,

तुम खो चुके हो अनंत में अब,

वापस इस जनम में तो नहीं आओगे,

आते अगर तो पूछना था तुमसे,

की तुममें थी हिम्मत इतनी कहां से आई,

तुम तो बड़े डरपोक से थे,

फिर सांसें तुम्हारी खुद खतम करने को

खुद में हिम्मत कहां से जुटा पाई,

मालूम हुआ घर से तुम्हारे,

की उन आखिरी पलों में तुम रोए बहुत थे,

शायद तुम्हे पछतावा था अपने किए का,

बचा लो मुझे गलती हो गई,

उस पल में सबसे तुम ये कह रहे थे,

पर मेरे दोस्त तब देर चुकी थी,

सांसें तुम्हारी अब

तुम्हारी भी नहीं सुन रही थी,

दीपावली का दिन था वो,

और मातम पसरा था घर में तुम्हारे,

सांसें टूट गई थी अगले दिन और,

टूटे थे साथ उम्मीदें सारे,

हम सहमे थे कई दिन तक इतने की,

जिक्र तुम्हारा करने से भी डरते थे,

सोचते थे तुम्हे हीं बस,

और अंदर हीं अंदर मरते थे,

वक्त लगा पर धीरे धीरे,

जख्म सबके थे भरने लगे,

डिग्री पूरी हो गई थी अगले साल सब की,

सब जिंदगी में अपनी,

कुछ न कुछ थे करने लगे,

पर हां

तुम्हे भूले नहीं हैं,

सोचते हैं तुम भी अगर जो साथ होते तो,

जिंदगी में अपनी कुछ न कुछ तो जरूर होते,

खैर

अब तुम जहां कहीं भी

जिस दुनिया में हो,

खुश रहना तुम जहां भी हो,

तुम चाहे याद ना भी करो,

हमसे न भूले जाओगे,

मेरे  यार मेरे दोस्त मेरे भाई,

तुम बहुत याद आओगे!

जिंदगी तुम्हे फिर जी कर देखेंगे....

कभी जो फुरसत में होंगे तब,
उलझनों को अपनी सुलझा कर देखेंगे,
याद करेंगे बचपन और,
पत्थर नदी में फिर से फेंकेंगे,
अधुरे ख्वाइशों को छोड़ रखा है,
किसी एक खास मकसद से,
निपट लें जिम्मेदारियों से पहले,
जिंदगी तुम्हे फिर जी कर देखेंगे!

ज़माना कोशिशें नहीं देखता बस, परिणाम देखा करता है....


तुम्हारे हारने की राह,

ज़माना देख रहा एक टक से है,

लड़ाई तुम्हारी मन मेरे,

क़िस्मत से नहीं तुम्हारे हक़ से है,

करो कोशिश आखिरी सांस तक तुम,

परिणाम रब पे छोड़ दो,

ख़ामख़ा के लोगों से,

तुम चाहो तो रिश्ता तोड़ दो,

मंज़िल प्रतीक्षा में है तुम्हारी,

दिल को यही पैगाम दो,

जो भी मन की चिंताएं हैं,

उन चिंताओं को तुम विराम दो,

बहकाये जो मन को बातें कोई,

वो बात वहीँ फिर रोक दो,

जितनी भी तुममे शक्ति है,

सारी की सारी झोंक दो,

किसी को खबर नहीं तुमने सहा है कितना,

कोई यहाँ नहीं कभी संघर्ष देखा करता है,

तुम्हे कामयाब होना हीं होगा,

तुम्हे कामयाब होना हीं होगा,

ज़माना कोशिशें नहीं देखता बस,

परिणाम देखा करता है!

मैं यूं बसर कर पाऊंगा....

बेफिक्र मन से रास्तों पे अपने,

न जाने कब गुज़र मैं पाऊंगा,

अबकी जो मैं सहमा हूं खुद से,

मन की अज्ञात इस व्यथा से

जाने कब उबर मैं पाऊंगा,

जब दूर तलक

कोई अपना नहीं दिखता है मुझे,

तो मैं आईने से हूँ पुछ रहा,

गुमनामी के इस शहर में कब तक,

मैं यूं बसर कर पाऊंगा!

थोड़ी सी किस्मत रूठी है...

तकलीफें दिल में ले कर हुं चल रहा,

चेहरे की मुस्कान भले हीं झूठी है,

तय करूंगा मैं भी मंज़िल अपनी,

पूर्णतः आस अभी न टूटी है,

इक दिन झुकेगा आसमां भी,

तुम देखना खिदमत में मेरी,

लगन सच्ची इरादे नेक हैं मेरे,

बस थोड़ी सी किस्मत रूठी है!

किसी को मनचाहा किरदार नहीं मिलता...

करो कोशिशें कितनी भी चाहे,

ख्वाबों वाला वो संसार नहीं मिलता,

निकल जाए अगर हाथ से तो,

मौका यहाँ पे बार बार नहीं मिलता,

अजब है बातें इस दुनिया की,

अजब है दस्तूर इस दुनिया का,

किसी को जिंदगी नहीं मिलती तो,

किसी को मनचाहा किरदार नहीं मिलता!

थाम कर हाथों में पेंसिल, एक बार मेरी खातिर लिख दे....



थाम कर हाथों में पेंसिल,

एक बार मेरी खातिर लिख दे,

वक़्त न जिसे बदल पाए,

ऐसी मेरी तक़दीर लिख दे,

जो कह न सके कभी होंठ मुझसे,

वो थोड़े से बात लिख दे,

मैं कहां कह रहा मेरे हिस्से,

तू पूरी कायनात लिख दे,

इन टूटे अरमानों के बीच,

एक नई सी शुरुआत लिख दे,

ख्वाबों में अक्सर ढूंढते हैं,

मिलन के अब दिन रात लिख दे,

थाम कर हाथों में पेंसिल,

एक बार मेरी खातिर लिख दे!

सब मांगते हैं कल सुनहरा,

तू मेरा सुनहरा आज लिख दे,

नई मंजिल दे जा कोई,

नया कोई आगाज़ लिख दे,

रास्ता कल का बता दे या,

मेरे इश्क का अंजाम लिख दे,

तेरे हाथों अगर जीत नहीं तो,

मेरे हिस्से में मात लिख दे,

जो हक में हो वही देना मुझे,

नही चाहता मेरे हिस्से

तू कोई खैरात लिख दे,

तू ले जा सब तस्वीरें अपनी,

हिस्से में मेरे यादों की बारात लिख दे,

थाम कर हाथों में पेंसिल,

एक बार मेरी खातिर लिख दे!

दिल में जो है मेरे लिए,

वो थोड़े जज़्बात लिख दे,

दिल की इस बंजर जमीन के हिस्से,

थोड़ी सी बरसात लिख दे,

दूरियां बहुत सह ली हमने,

कुछ पल की अब मुलाक़ात लिख दे,

और अगर मैं तेरे लायक नहीं,

तो मेरी औकात लिख दे,

थाम कर हाथों में पेंसिल,

एक बार मेरी खातिर लिख दे!

कुछ यूँ ही.....

 जब उलझनों में खुद को,

उलझा सा मैं पाता हूँ,

चलते चलते राहों में जब,

अचानक रुक सा जाता हूँ,

आईने में अक्सर जब,

खुद को तलाशता रहता हूँ,

लोग पूछते हैं वजह फिर भी,

जब लोगों से छुपाता हूँ,

तुम्हें सोचता हूँ,

तुम्हें खोजता हूँ,

तू दिखती ना जब पास मेरे,

मैं थोड़ा सहम सा जाता हूँ,

आज भी सब कुछ वैसा हीं है,

दिन वही रातें भी वही,

ज़िद्द वही बातें भी वही,

दिल ढूढ़ता फिर जवाब यही,

क्यूँ साथ मेरे अब तू नहीं

क्यूँ साथ मेरे अब तू नहीं....

नाकामियां साजिशें हैरानियाँ....

नाकामियां साजिशें हैरानियाँ
सब खड़े मेरे सामने फिर भी,
ये कदम नहीं रुकने वाले,
बुलंद इरादे मेरे कहां,
इतनी आसानी से हैं झुकने वाले,
कुछ किस्से कुछ कहानियों को,
हम छोड़ आए हैं पीछे हीं,
ताल्लुक था जिनका उदासी से,
दिल को जो थे दुखने वाले! 

जिस पे है गुजरी वही जाना है..

सोचने से मंज़िल नहीं मिली किसी को,
जीता वही जो यहाँ लड़ा है,
अरे दुःख को भी इतनी फुर्सत कहाँ की,
किसी एक के हीं पीछे पड़ा है,
जिस पे है गुजरी वही जाना है,
दुःख की क्या है परिभाषा वरना ,
हर किसी को यहाँ यही है लगता,
दुःख उसका हीं बस सबसे बड़ा है!

अब से जल्दी सोया करेंगे, मोहब्बत छोड़ दी मैंने..




अब लगता है यूँ मन मेरा,
थोड़ा शांत सा है हो गया,
मिल गया वो सुकून भी,
जो था कहीं पे खो गया,
उलझा था कुछ ऐसे की,
खुद को भी भूल बैठा था,
सुबह शाम दिन रात सब,
उसके नाम कर बैठा था,
वादों से बंधी जंजीर थी एक,
जो अब तोड़ दी मैंने,
अब से जल्दी सोया करेंगे,
मोहब्बत छोड़ दी मैंने,
कहती थी दुनिया मुझसे,
खुद से ज़्यादा न चाह किसी को,
सब अपने आप में उलझे हैं,
यहाँ प्यार की न परवाह किसी को,
देख बस तू सपने और,
राहें खुद अपनी बनाता चल,
टूटे मन जो कभी कहीं,
तो खुद मन को समझाता चल,
सुन लिया और समझ भी लिया,
सब भूल के जो अब तक किया,
बस अपने ख्वाबों की ओर,
ज़िन्दगी को नयी राह मोड़ दी मैंने,
अब से जल्दी सोया करेंगे,
मोहब्बत छोड़ दी मैंने!

बहुत जी लिया माँ दूर तेरे से, कुछ पल हीं साथ आ जाओ न..



आँगन का कण कण है पावन,
छू कर माटी तेरे चरणों की,
मन भूखा है प्रण भूखा,
दिल भूखा तेरे शरणों की,
आ के उन यादों को हीं,
सहज भाव दे जाओ न,
बहुत जी लिया माँ दूर तेरे से,
कुछ पल हीं साथ आ जाओ न,
जाने का जादू होता माँ,
तेरे हाथों की उन रोटी में,
गुस्से में भी प्यार था तेरे,
गलती मेरी बड़ी या छोटी में,
आज अपनी गलती पे खुद को,
समझाना मुश्किल लगता है,
तेरे और मेरे समझाने में,
है फर्क समझ मुझे आता है,
इक बार फिर मेरी गलती पे,
डाँट कर थोड़ा समझाओ न,
बहुत जी लिया माँ दूर तेरे से,
कुछ पल हीं साथ आ जाओ न,
कभी नींद नहीं आती रातों में,
कभी डरता हूँ बुरे सपनो से,
गैरों में भी खुश नहीं हूँ,
और बचता भी हूँ अपनों से,
एक ज़िद्द है कुछ पाने की,
तुम्हारे उम्मीदों पर उतर जाने की,
रख दूँ क़दमों में तेरे ला के,
सारी खुशी इस ज़माने की,
फिलहाल फ़ोन हीं करता हूँ,
कोई लोड़ी हीं आज सुनाओ न,
बहुत जी लिया माँ दूर तेरे से,
कुछ पल हीं साथ आ जाओ न!