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नाराज़गी



नाराज़गी

खुद से,

खुद को बेहतर ना बना पाने की,

या खुद में रह कर,

खुद को ना समझ पाने की,

कुछ खास जिसे,

अभी तक भी पा ना सका,

या कोई राह जिसपे,

चाह कर भी मैं जा ना सका,

कुछ बंदिशें जिसे,

था तोड़ना मुझे कब का,

कुछ आदतें जिसे,

था छोड़ना मुझे कब का,

कुछ ख्वाब जो महज,

ख्वाब हीं रह गए,

कुछ अरमान दिल के,

जो बस दिल में हीं रह गए,

जो ख्वाइशें थी मेरे दिल की,

क्यूँ ना कह पाया किसी से अब तक,

कोई भरोसा या कोई सांत्वना,

क्यूँ मिला नहीं मुझे किसी से अब तक,

ये मेरी जरुरत थी या मजबूरी,

जो मैं दूर आ गया अपनों से,

जिनके लिए था जीता कभी,

मैं डरने लगा उन सपनो से,

मैं छोड़ सवेरे घर के अपने,

कहीं पड़ा रहा वीराने में,

अब ढूंढने में हुँ लगा,

कमी मुझमे थी या ज़माने में,

इन्ही दो प्रश्नों में उलझा हुँ आज कल,

सोचता हुँ कभी की,

बाँट लूँ थोड़ा,

मन की अपनी ये चिंताएं,

पर समझे आखिर कौन मुझे,

मन की मेरी ये व्यथाएँ,

कोई सुने मुझको ख़ामोशी से,

अपने प्रश्नों को रख के खुद में,

कहाँ मिला मुझे कोई अब तक ऐसा,

तभी उलझा रहा हुँ अब तक खुद में,

समेट रहा हुँ लम्हों को,

बीती हुई कुछ यादों को,

खुद को याद दिला रहा हुँ,

खुद से किये कुछ वादों को,

बस इन्ही उलझनों में कहीं,

खो गई है चेहरे की ताज़गी,

मुझपे आज कल हावी है,

मुझसे ये मेरी नाराज़गी!

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