यहाँ कौन किसी की सुनता है,
तू मत हीं किसी को ज्ञान दे,
क्या कमी रही होगी इस बार,
तू उसपे बस ध्यान दे,
जो जलते हों देख तुझे,
उन आंखों को चाहे तू खलता रह,
बस मंजिल को ध्यान में रख के,
राहों पे निडर तू चलता रह,
क़िस्मत चाहे रूठी भी हो,
तू कायम रह अपनी मेहनत पे,
वो देगा वही जो अच्छा होगा,
क्यों रुकना बस उसकी रहमत पे,
चलो फिर साथ मिल कर हीं,
अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हैं,
फिर से हौसला भड़ते हैं,
एक और कोशिश करते हैं।
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