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एक और कोशिश करते हैं।



यहाँ कौन किसी की सुनता है,
तू मत हीं किसी को ज्ञान दे,
क्या कमी रही होगी इस बार,
तू उसपे बस ध्यान दे,
जो जलते हों देख तुझे,
उन आंखों को चाहे तू खलता रह,
बस मंजिल को ध्यान में रख के,
राहों पे निडर तू चलता रह,
क़िस्मत चाहे रूठी भी हो,
तू कायम रह अपनी मेहनत पे,
वो देगा वही जो अच्छा होगा,
क्यों रुकना बस उसकी रहमत पे,
चलो फिर साथ मिल कर हीं,
अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हैं,
फिर से हौसला भड़ते हैं,
एक और कोशिश करते हैं।

 बिन तुम्हारे



तुम बिन बड़ा खाली सा है,

वो लम्हा,

कि जिसमे तुम पास थे,

ये घर की जिसमे तुम साथ थे,

घर में सब कुछ तो वही है,

वही पलंग वही सोफा,

वही खिड़की वही परदे,

पर इनमे वो रौनक हीं नहीं,

जो तुम्हारे होने से रहती है,

इनमे खूबसूरती तो है पर सादगी नहीं,

जो इनमे तू बिखेरती है,

कहो तो तुम्हे बताऊँ मैं,

कि तुम बिन मैं कितना अकेला हूँ,

समझ लो जैसे कि,

इंद्रा धनुष रंगो के बिन,

आसमा पतंगों के बिन,

जवानी कोई उमंगों के बिन,

या समंदर जैसे तरंगों के बिन,

फूल कोई हो खुशबु बिन,

दीप कोई हो बाती बिन,

सुर जैसे हो ताल बिन,

और दिन तनहा जैसे रात बिन,

सोच सोच दिन रात खुद को,

और बेहतर पहचाना ये,

दिल की एक बात तुम्हे,

तुम बिन रह कर है जाना ये,

ये धरती, अम्बर, चाँद, सितारे,

अच्छे नहीं लगते बिन तुम्हारे,

ये ख्वाब, हक़ीक़त,दुनिया के नज़ारे,

भाते नहीं मुझे बिन तुम्हारे!

नाराज़गी



नाराज़गी

खुद से,

खुद को बेहतर ना बना पाने की,

या खुद में रह कर,

खुद को ना समझ पाने की,

कुछ खास जिसे,

अभी तक भी पा ना सका,

या कोई राह जिसपे,

चाह कर भी मैं जा ना सका,

कुछ बंदिशें जिसे,

था तोड़ना मुझे कब का,

कुछ आदतें जिसे,

था छोड़ना मुझे कब का,

कुछ ख्वाब जो महज,

ख्वाब हीं रह गए,

कुछ अरमान दिल के,

जो बस दिल में हीं रह गए,

जो ख्वाइशें थी मेरे दिल की,

क्यूँ ना कह पाया किसी से अब तक,

कोई भरोसा या कोई सांत्वना,

क्यूँ मिला नहीं मुझे किसी से अब तक,

ये मेरी जरुरत थी या मजबूरी,

जो मैं दूर आ गया अपनों से,

जिनके लिए था जीता कभी,

मैं डरने लगा उन सपनो से,

मैं छोड़ सवेरे घर के अपने,

कहीं पड़ा रहा वीराने में,

अब ढूंढने में हुँ लगा,

कमी मुझमे थी या ज़माने में,

इन्ही दो प्रश्नों में उलझा हुँ आज कल,

सोचता हुँ कभी की,

बाँट लूँ थोड़ा,

मन की अपनी ये चिंताएं,

पर समझे आखिर कौन मुझे,

मन की मेरी ये व्यथाएँ,

कोई सुने मुझको ख़ामोशी से,

अपने प्रश्नों को रख के खुद में,

कहाँ मिला मुझे कोई अब तक ऐसा,

तभी उलझा रहा हुँ अब तक खुद में,

समेट रहा हुँ लम्हों को,

बीती हुई कुछ यादों को,

खुद को याद दिला रहा हुँ,

खुद से किये कुछ वादों को,

बस इन्ही उलझनों में कहीं,

खो गई है चेहरे की ताज़गी,

मुझपे आज कल हावी है,

मुझसे ये मेरी नाराज़गी!