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 बिन तुम्हारे



तुम बिन बड़ा खाली सा है,

वो लम्हा,

कि जिसमे तुम पास थे,

ये घर की जिसमे तुम साथ थे,

घर में सब कुछ तो वही है,

वही पलंग वही सोफा,

वही खिड़की वही परदे,

पर इनमे वो रौनक हीं नहीं,

जो तुम्हारे होने से रहती है,

इनमे खूबसूरती तो है पर सादगी नहीं,

जो इनमे तू बिखेरती है,

कहो तो तुम्हे बताऊँ मैं,

कि तुम बिन मैं कितना अकेला हूँ,

समझ लो जैसे कि,

इंद्रा धनुष रंगो के बिन,

आसमा पतंगों के बिन,

जवानी कोई उमंगों के बिन,

या समंदर जैसे तरंगों के बिन,

फूल कोई हो खुशबु बिन,

दीप कोई हो बाती बिन,

सुर जैसे हो ताल बिन,

और दिन तनहा जैसे रात बिन,

सोच सोच दिन रात खुद को,

और बेहतर पहचाना ये,

दिल की एक बात तुम्हे,

तुम बिन रह कर है जाना ये,

ये धरती, अम्बर, चाँद, सितारे,

अच्छे नहीं लगते बिन तुम्हारे,

ये ख्वाब, हक़ीक़त,दुनिया के नज़ारे,

भाते नहीं मुझे बिन तुम्हारे!

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