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इससे आगे दिखता ना कुछ, 
कितनी अजीब सी ये बदहाली है,
मन मेरा क्रोधित सा है,
और हाथ दोनो मेरे खाली हैं,
नींदें कहीं लापता हों जैसे,
अनगिनत खयाल हैं चल रहे,
सूरज को भी है रोक रखा,
ये रात कितनी काली है,
टूटे हौंसले कई मर्तबा पर,
हमने सांसें संभाली है,
गैरों को भी अपना कह के,
गलतफहमी भी पाली है,
खुद को यकीन दिलाना,
मुश्किल सा हो रहा है की,
जो ख्वाब जाग रातों को पकाए, 
पुलाओ ये ख्याली हैं। 

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