एक नई शुरुआत: जब कलम फिर से बोल उठी!
जिंदगी के हर सफर की तरह, मेरे लेखन का यह सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक समय ऐसा आया जब करीब सौ कविताएं लिखने के बाद, मेरा मन अपनी ही लिखावट से ऊब गया था। वह मोड़ इतना गहरा था कि मैंने लिखने से ही मुँह मोड़ना चाहा और अपनी डायरी के उन तमाम पन्नों को फाड़ दिया, जिन्हें मैंने सालों की मेहनत और भावनाओं से सींचा था।
यह साल 2013 की बात है, जब मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में एक नए संघर्ष की ओर निकल पड़ा था। उस वक्त लगा जैसे शब्दों का साथ छूट गया है।
पर कहते हैं न कि जिससे रूह का रिश्ता हो, उससे दूरी मुमकिन नहीं। शब्दों से मेरा लगाव कुछ इस कदर था कि मैं चाहकर भी बहुत ज्यादा दिनों तक खुद को कलम उठाने से रोक नहीं सका।
भीतर की बेचैनी और जज्बातों के शोर ने मुझे फिर से पुकारा। हार मानकर नहीं, बल्कि एक नए संकल्प के साथ मैंने पुनः निश्चय किया कि मैं फिर से लिखूँगा। और इस बार, मेरी कलम पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और स्पष्ट थी।
"वो पन्ने तो फट गए थे, पर स्याही का निशान आज भी दिल पर बाकी था।"
कुछ समय के अंतराल के बाद जब मैंने दोबारा लिखने का निश्चय किया, तब जो कविता कागज़ पर उतरी, वह मेरे दिल के सबसे करीब है। यह एक ऐसी रचना है जिसे मैंने आज तक कभी बदलना नहीं चाहा। जैसे ही मैंने कलम उठाई, शब्द बिना रुके खुद-ब-खुद डायरी पर उतरते चले गए।
आज वही कविता और वही अहसास मैं आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ...
छोटी सी इस ज़िन्दगी की,
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