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| chalo fir kisi ajnabi se dil lagaya jaaye.. |
चलो फिर किसी अजनबी से दिल लगाया जाए,
खाली सा मन होता हर पल,
और नींद भी अच्छी आती है,
पर बेचैनियों वाली वो,
रातें भी याद आती हैं
भूख भी होती थी फिर भी,
खाया कुछ न जाता था,
नींद भी पलकों में होती,
पर जाग के रात बिताता था,
सोच रहा हु फिर से वही,
दिन को एक बार दुहराया जाए,
बहुत खुशगवार सी चल रही गई ज़िंदगी मेरी,
चलो फिर किसी अजनबी से दिल लगाया जाए,
वो बेचैनियां जो सीने में,
हर वक़्त ही उतरा करती थी,
संभल नहीं पता था दिल,
चाहे कितना भी धड़कन डरती थी,
खो देती थी खुद को हर बार,
इश्क़ की उन सूनी राहों में,
पर भूल भी जाती थी हर गम,
जब होती महबूब की बाहों में,
अब खो दिया सब कुछ फिर भी,
दिल ए नादान अब भी कहता है,
सो लिए अच्छी नींद बहुत,
अब खुद को थोड़ा सताया जाए,
बहुत खुशगवार सी चल रही गई ज़िंदगी मेरी,
चलो फिर किसी अजनबी से दिल लगाया जाए!

2 टिप्पणियां:
Nice lines ....
Dhanyavad..
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